Sunday, January 24, 2016





दादी

सुबह की पहली किरण की तरफ मुख करके धीमी धीमी आवाज़ में , 
ओम का जाप करती थी मेरी दादी..
सर पर पल्लू लिए , मन में सच्ची भावना कि साथ, भगवान को स्मरण करती थी मेरी दादी ... 
आज बहुत याद आ रही है दादी 
आज भी एक सुबह है , पर वो कही नहीं है ना उनकी वो अवाज़ हैं , ना घर मेँ गूंजती उनकी प्राथना है ... 

आज भी हर सुबह जैसे अख़बार आया है पर चस्मा लगकर उसे नहीं पढ़ पाएगी मेरी दादी
ध्वनि का एहसास तो भगवान ने कबका छीन लिया था
पर फिर भी अखबार के शब्दों से दुनिया की हर छोटे बड़ी बात को समझ लेती थी मेरी दादी... 

कभी सोचूं तो नहीं समझ पाती मैं की कैसा होता होगा ,
इस दुनिया को देख तो पाना, पर किसी भी अवाज़ को ना सुन पाना ..
ऐक इंसान जिसने सब कुछ सुना है , उसके लिए दुनिया का ऐक दिन शांत हो जाना .., 
पर दादी को देखकर ऐसा लगता था की अपनी सूझ बूझ से इंसान अपनी कमी पर भी विजय पा सकता है , दुनिया से कटकर भी दुनिया मेँ रूचि जागा सकता है .. 
एहसास से सबकुछ भाप लेती थी ऐसी थी मेरी दादी ... आज बहुत याद आ रही है दादी 

शाम को मम्मी के साथ बैठकर टीवी का मज़ा लेती थी.. 
बंगला हिंदी सुन तो नही पाती थी , पर हर कुछ समझ जाती थी मेरी दादी
दादी का टीवी दखकर ज़ोर जोर हसना बहुत याद आएगा... 
टीवी तो अब भी हर शाम गूजेंगा पर नही गुंजेगी अब से दादी की वो प्यारी हसीं ... 
कहाँ चली गयी दादी ... थोड़ा और रुक जाती दादी ... 

शाम को हर कमरे में प्रकाश कर दो, हर जगह लाइट जला दो , ऎसा कहती थी दादी
आज भी मैंने वही किया हैं पर ऎसा कर दो, ये कहने वाली दादी आस पास कही नहीं है
ये वही कमरा है जिसमेँ दादी रहती थी , 
कही दादी की दवाइया पड़ी हैं कहीं उनकै कपडे और कही उनकी किताबे ... 
उनके हर कपडे से उनकि खुशबू , उनका एहसास आता है ..
पर वो कही नही है रात को उसी बिछावन पर हमेशा जैसी सोयी थी मैं .. 
पर बीच रात में दादी की आवाज़ ने इस बार नही उठाया मुझे ,
इस शांति से तो अच्छी अवाज़ ही थी
ऎसे क्यों चली गई दादी ... थोडा और रुक जाती दादी.. 

हर बार जो मेरे घर आने का इंतज़ार करती थी
मेरे घर आने पर मुझे गले से लगाती थी
इस बार वो मेरे आने पर बिलकुल शांत थी
आराम से लेटी हुई थी चेहरे पर एक सा भाव बनाये 
दुनिया से आँख मूंद चुकी थी मेरी दादी
लगता है जैसे इस बार दादी को जल्दी थी 
शायद कही और जाने की प्रतिबद्धता थी
तभी नही रुकी इस बार मेरी दादी ... 

इसान शांत हो जाता है , 
अवाज़ चली जाती है पर लम्हें , यादें रह जातीं हैं , 
हस्ता हुआ चेहरा मन मेँ समां जता है 
इसलिए दूर होकर भी आप सबके बहुत पास हो दादी .. 
आपकी हर बात याद आएगी ,
आपका चहरा बहुत याद आएगा 
 सबके मन मेँ अमिट छाप छोड़ कर भगवान मेँ विलीन हो गयी मेरी दादी 
सबको बहुत याद आएंगी दादी ...